Wednesday, 31 July 2019

मन में आकाश की ऊँचाई तू..

मन में आकाश की ऊँचाई तू,
रख़ हमेशा,
मन में सागर की गहराई तू,
रख़ हमेशा,

ऐ इन्सान तू डरता है क्या,
आँखों में आशा के दीये तू,
जला के रख़ हमेशा,

मन में आकाश की ऊँचाई तू,
रख़ हमेशा,
मन में सागर की गहराई तू,
रख़ हमेशा,

पाँव थक जाएँ तो,
थोड़ा थम जा जरा,
आँखे अगर थक जाएँ तो,
थोड़ा पलकें झुका,

पर रूकना ना तू,
सदा के लिए,
चलते रहना तू जैसे,
चलती है धरती सदा,

मन में आकाश की ऊँचाई तू,
रख़ हमेशा,
मन में सागर की गहराई तू,
रख़ हमेशा,

मन में आकाश की ऊँचाई तू,
रख़ हमेशा,
मन में सागर की गहराई तू,
रख़ हमेशा 
कवि मनीष 

Tuesday, 30 July 2019

वो किसान है जो..

वो किसान है जो,
निवाला हमे देता है,
वो किसान है जो,
पसीना सबके लिए बहाता है,

वो किसान है जो,
निवाला हमें देता है, 

पर बदले में उसे जो मिलता है,
उससे क्या उसका जीवन चलता है,
कुछ बातें सदा उसके लिए लिखा करो,
इसी से तो उसे जीनें का दम मिलता है,

वो किसान है जो,
निवाला हमें देता है,
वो किसान है जो,
निवाला हमें देता है,

जब भी देखो उसकी दुर्दशा तुम,
आवाज़ अक़्सर तुम उठाया करो,
वो तो तुमको अपना समझते हैं हीं,
तुम भी उनको अपना समझा करो,

क्योंकि वो किसान है जो,
सूरज को भी झुका देता है,
वो किसान है जो,
निवाला हमें देता है,

वो किसान है जो,
पसीना सबके लिए बहाता है,
वो किसान है जो,
निवाला हमें देता है

कवि मनीष 

Sunday, 28 July 2019

जीवन का हर पल..

जीवन का हर पल क़ुर्बान करते हैं,
हम हैं फ़ौजी लहू अपना सदा नाम वतन के करते हैं,
हमारे लिए सदा सम्मान बचा के रख़ना ज़रा,
क्योंकि वतन की मिट्टी को हम सदा सलाम करते हैं

हम हैं फ़ौजी लहू अपना सदा नाम वतन के करते हैं,

आँसू की हर एक बूंद हम पीते हैं,
ख़ून से अपनीं मिट्टी वतन की सींचते हैं,
आँखों में हरदम ज़िन्दा वतन की तस्वीर रख़ते हैं,
दिखे जो पतझड़ तो उसे बहार करते हैं 

हम हैं फ़ौजी लहू अपना सदा नाम वतन के करते हैं,

जीवन का हर पल क़ुर्बान करते हैं,
हम हैं फ़ौजी लहू अपना सदा नाम वतन के करते हैं,
हमारे लिए सदा सम्मान बचा के रख़ना ज़रा,
क्योंकि वतन मिट्टी को हम सदा सलाम करते हैं 

हम हैं फ़ौजी लहू अपना सदा नाम वतन के करते हैं
कवि मनीष 



Saturday, 27 July 2019

कहता है गर्व से..


                        
कहता है गर्व से ये तिरंगा हमारा,
ये तीनों रंग है मेरे तेरे खुशहाली का किनारा,
ये तीनों रंग हैं मेरे मज़हबों का संगम,
ये मेरे रंग हीं बनातें हैं तस्वीर हमारे वतन का न्यारा
कवि मनीष 

Friday, 26 July 2019

शहीदों के लहू से..

शहीदों के लहू से जब रंगता है हिमालय,
तब जीत की गूंज से गूंजता है हिमालय,
जो जान हथेली पर लेके चलते हैं,
उन्हीं लहू की इबारत लिखता है हिमालय,

हम हीं तो हैं हाफ़िज़ ए वतन,
हम हीं से है ज़िन्दा वतन,
हम हैं तो है हँसता तिरंगा,
हम हीं से है महकता चमन,

जीत का परचम हम जब हैं लहराते,
आगे हमारे सर झुकाता है हिमालय,
शहीदों के लहू से जब रंगता है हिमालय,
तब जीत की गूंज से  गूंजता है हिमालय,

शहीदों के लहू से जब रंगता है हिमालय,
तब जीत की गूंज से गूंजता है हिमालय,
जो जान हथेली पर लेके चलते हैं,
उन्हीं लहू की इबारत लिखता है हिमालय,

उन्हीं लहू की इबारत लिखता है हिमालय,
उन्हीं लहू की इबारत लिखता है हिमालय,
उन्हीं लहू की इबारत लिखता है हिमालय,
उन्हीं लहू की इबारत लिखता है हिमालय 
कवि मनीष 

Thursday, 25 July 2019

खुशी के साथ..

खुशी के साथ ग़र ग़म ना होता,
प्यार के साथ कभी नफ़रत ना होता,
तब ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नहीं होती,
वसंत के साथ कभी पतझड़ ना होता,

यही है जीवन का उसूल,
अगर बहार है तो ख़ार भी है,
अगर सूखा है तो बरसात भी है,
हर इन्सान को थाम के चलना है इन दोनों का दामन,

क्योंकि दिन है तो रात भी है,
अगर है सूरज तो माहताब भी है,
अगर ऐसा ना होता तो क़ुदरत ना होता,
खुशी के साथ ग़म ना होता,

खुशी के साथ ग़र गम ना होता,
प्यार के साथ कभी नफ़रत ना होता,
तब ज़िन्दगी, ज़िन्दगी नहीं होती,
वसंत के साथ कभी पतझड़ ना होता
कवि मनीष 



Wednesday, 24 July 2019

हैं निगाहें आपकी जैसे..

हैं निगाहें आपकी जैसे,
नीला-नीला हो समंदर,
है बातें आपकी जैसे,
छाया हो धूप में बादल,

रंग है आपका जैसे,
फूलों की होती है रंगत,
हैं बातें आपकी जैसे,
छाया हो धूप में बादल,

बातें हैं आपकी जैसे,
टिमटिमाते हैं तारे पल-पल,
हैं बातें आपकी जैसे,
छाया हो धूप में बादल,

छाया हो धूप में बादल,
छाया हो धूप में बादल,
छाया हो धूप में बादल,
छाया हो धूप में बादल 
कवि मनीष 

प्रेम जब पहुँचे हिर्दय की गहराई तक, पराकाष्ठा पहुँचे उसकी नभ की ऊँचाई तक, प्रेम अगर रहे निर्मल गंगा माई के जैसे, वो प्रेम पहुँचे जटाधारी के ...