Thursday, 7 May 2020

ज्ञान और शांति का उपदेश देनेंवाले,
युद्ध के मार्ग से जग को बचानेंवाले,
है आज उसके जन्म,ज्ञान,महानिर्वाण तीनों का संगम,
है पाता वो परमशांति को जो करता है सर्वस्व अपना बुद्ध के हवाले

बुद्ध पूर्णिमा की ढ़ेरों शुभकामनाएँ 
कवि मनीष 
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Wednesday, 6 May 2020

मच्छर



गुनगुनाते,भनभनाते ये मच्छर,
पंखों को हिला हिलाकर,
कोई धुन सुनाते ये मच्छर,

काटते इधर-उधर,
मंडरा-मंडारकर सताते दिन भर,
ख़ून पी पीकर बीमारियाँ फैलातें,
बग़ैर उपाय के नहीं भागतें,

ये कैसा कीड़ा बनाया ऊपरवाले नें,
हिर्दय में तनिक भी दया न जिसके,
कह रहा हर जीव ये
चीख़,चीख़कर,

गुनगुनाते,भनभनाते ये मच्छर,
पंखों को हिला हिलाकर,
कोई धुन सुनाते ये मच्छर

कवि मनीष 
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Tuesday, 5 May 2020

कतार लगती है जब,
शराब की दुकानों पर,
तो समझ जाओ,
अमृत है बिक रही मयख़ानें पर,

लोग समझतें हैं,
है ये चीज़ बुरी,
तो क्यों लोग हैं बेचैन,
इसे लेनें पर,

अगर दूध की दुकानों पर भी,
सरकार लगा दे ताला,
और दे उसे भी छूट,
शराब वाला,

तब दूध के दुकानों पर भी,
दिखेगी तुमको यही मारामारी,
वहाँ भी दिखेगी तुमको,
यही बेचैनीं,

चीज़ अच्छी हो या बुरी,
अगर आप उसका,
करते हैं अतिसेवन,
तभी वो देता है,
आपको मृत्यु का धरातल,

तो हर चीज़,
लो संयम से,
तभी वो होगी आपके ख़ातिर,
न अमृत से कमतर,

कतार लगती है जब,
शराब की दुकानों पर,
तो समझ जाओ,
अमृत है बिक रही मयख़ाने पर

कवि मनीष 
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Monday, 4 May 2020

प्रेम की पुकार आई,
जब कृष्ण नें बंसी बजाई,
राधा दौड़ी चली आई,
जब कृष्ण नें बंसी बजाई,

राधा-कृष्ण का प्रेम उपवन,
है सच्चे प्रेम का मधुवन,
सारे जग पे,
सावन की घटा छाई,

प्रेम की पुकार आई,
जब कृष्ण नें बंसी बजाई,
राधा दौड़ी चली आई,
जब कृष्ण नें बंसी बजाई 

कवि मनीष 
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Sunday, 3 May 2020

हँसना,हँसाना है, जीवन का अनमोल उपहार,
ये तो है, जीवन का अनुपम श्रृंगार,
हँसनें-हँसानें बग़ैर जीवन में वसंत आता नहीं,
बग़ैर इसके है नहीं होता जीवन में चमत्कार,

ये है जीवन का ऐसा रंग,
जो है जीवन में लाता उमंग,
इससे हीं है पूरा होता जीवन सरगम,
यही है बरसाता हर चेहरे पर खुशियों की बौछार,

हँसना-हँसाना है, जीवन का अनमोल उपहार,
ये तो है जीवन का अनुपम श्रृंगार,
हँसनें-हँसानें बग़ैर जीवन में वसंत आता नहीं,
बग़ैर इसके है नहीं होता जीवन में चमत्कार 

कवि मनीष 
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Saturday, 2 May 2020

सवेरे की लाली है होती जैसे,
है मेरी माता का मुखड़ा वैसे,
इसको देख झूम कर है आती बहार,
सारे जग पर है हो जाता वसंत का श्रृंगार,

ख़िलतीं हैं कलियाँ तुझको देखकर,
तेरे साथ आता है सावन झूम झूमकर,
तेरी अनुकंपा है बरसती ऐसे,
पूनम में चाँदनीं बरसती है जैसे,

सवेरे की लाली है होती जैसे,
है मेरी माता का मुखड़ा वैसे,
इसको देख झूम कर है आती बहार,
सारे जग पे है हो जाता वसंत का श्रृंगार

कवि मनीष
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Friday, 1 May 2020


चार पैसों की ख़ातिर,
जो हैं हो जातें मरनें को मजबूर,
हैं कहलाते वो मजदूर,

हर युग में मजदूर,
सड़क पे है आता,
प्रशासन है सबकी ख़बर रखता,
पर केवल मजदूर हीं है इधर-उधर भटकता,

आज भी मजदूरों की है यही हालत,
कल भी रहेगी,
और हमेशा रहेगी,

कोई सड़क पे पड़ा,
गाड़ियों के है नीचे आता,
कोई अपनों को मिलनें की ख़ातिर,
दिन-रात है आँसू बहाता,

पर वो जीवन का सूरज,
होता नहीं सामनें उनके कभी हाज़िर,

चार पैसों की ख़ातिर,
जो हैं हो जातें मरनें को मजबूर,
हैं कहलातें वो मजदूर

कवि मनीष
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प्रेम जब पहुँचे हिर्दय की गहराई तक, पराकाष्ठा पहुँचे उसकी नभ की ऊँचाई तक, प्रेम अगर रहे निर्मल गंगा माई के जैसे, वो प्रेम पहुँचे जटाधारी के ...