Saturday, 31 August 2019

जीवन

जीवन है गुलशन रंग-बिरंगे फूलों का,
जीवन है आकाश चमचमाते सितारों का,
है इन्सानियत जिसके भीतर जिंदा,
जीवन है उसका दर्पण सच्चे नजारों का
कवि मनीष 

Thursday, 29 August 2019

प्रेम

प्रेम हीं है सबसे बड़ी वंदना,
प्रेम हीं है सबसे बड़ी आराधना,
इन्सान के प्रत्येक गुण को निखारता है प्रेम हीं,
प्रेम हीं है सबसे बड़ी साधना
कवि मनीष 

Wednesday, 28 August 2019

चाँद को जब जलाता है..

चाँद को जब जलाता है सूरज,
वो देता है शीतलता,
सूरज में है आग पर उससे हीं,
जीवन है पलता,

बरसों लग जाती है,
जीवन को देनें में आकार,
इस क्रम में अक़्सर,
इन्सान है संघर्ष में झुलसता,

किसी और के जीवन को भी,
अपना जीवन समझो,
तभी आँसुओं से,
प्रेम है झलकता,

चाँद को जब जलाता है सूरज,
वो देता है शीतलता,
सूरज में है आग पर उससे हीं,
जीवन है पलता
कवि मनीष 

भारत

है प्रेम का प्रतीक जिसका नाम है भारत,
है एकता का प्रतीक जिसका नाम है भारत,
बस चलना है साथ मिलकर,
क्योंकि है ईमान का प्रतीक जिसका नाम है भारत 
कवि मनीष 

Monday, 26 August 2019

प्रेम हीं जीवन है..

प्रेम हीं जीवन है,
जीवन हीं प्रेम है,
हर आवाज़ की मधुरता प्रेम है,

प्रेम हीं जीवन है,
जीवन हीं प्रेम है,

आकाश का क्षितिज पर,
धरती से मिलना प्रेम है,
सूरज की आग से,
धरती की पलना प्रेम है,

प्रेम हीं जीवन है,
जीवन हीं प्रेम है,

खुशबू का फूलों में समाना प्रेम है,
अनेकता में एकता का परिचायक,
देश ये हमारा प्रेम है,

प्रेम हीं जीवन है,
जीवन हीं प्रेम है,
हर आवाज़ की मधुरता प्रेम है,

प्रेम हीं जीवन है,
जीवन हीं प्रेम है 
कवि मनीष 

Sunday, 25 August 2019

देश हीं आत्मा है..

देश हीं आत्मा है,
देश हीं हमारा गुलशन है,
वतन के नाम पर,
वतन के नाम पर,

जो ना सर झुकाते हैं,

ज़िन्दगी उनकी इक दिन,
बंजर हो जाती है,
कांटों की गलियों में ख़ो जाती है,

वतन वो पेड़ जिसके,
तले हम छाँव पाते हैं,
ये वो गगन है जिसके,
तले हम स्वतंत्र गीत गाते हैं,

वतन हँसता है तभी तो हम,
मुस्कुराते हैं,

वतन हीं आत्मा है,
वतन हीं हमारा गुलशन है,
देश हीं आत्मा है,
देश हीं हमारा गुलशन है,

देश हीं आत्मा है,
देश हीं हमारा गुलशन है 
कवि मनीष 

श्री अरूण जेटली

मौत किसी का ग़ुलाम नहीं होता,
ज़िन्दगी का वो मेहमान नहीं होता,
कब उसके शिकंजे में कौन आ जाए,
किसी को इसका अनुमान नहीं होता
कवि मनीष 

प्रेम जब पहुँचे हिर्दय की गहराई तक, पराकाष्ठा पहुँचे उसकी नभ की ऊँचाई तक, प्रेम अगर रहे निर्मल गंगा माई के जैसे, वो प्रेम पहुँचे जटाधारी के ...