Thursday, 30 April 2020

जीवन कब छीन जाए ये कोई नहीं है जानता,
एक बार जो ये सूरज डूब जाए तो फिर नहीं उगता,
                     मैं तो सदा मुस्कुराता हीं रहा,                         जो ज़िंदादिली की है पहचान वो कभी नहीं मरता

कवि मनीष 
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जय हो सृष्टि रचियता,
जय हो विधाता,
जय हो ब्रह्म देवा,

धरती का उपवन रचनें वाले,
हर रंग के पुष्प इसमें भरनें वाले,
जय हो सृष्टि रचियता,
जय हो ब्रह्म देवा,

जय हो सृष्टि रचियता,
जय हो विधाता,
जय हो जीवन दाता,

जय हो सृष्टि रचियता,
जय हो विधाता,
जय हो ब्रह्म देवा 

कवि मनीष 
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Wednesday, 29 April 2020

जीवन में जो चाहा वो किया हासिल,
मेरे जीवन की मौत नहीं है मंज़िल,
कलाकार है मरता पर उसकी कला नहीं,
मैं हमेशा आता रहूँगा लूटनें महफ़िल

कवि मनीष 
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 है ये सिलसिला किनारों का,
नहीं ये सिलसिला मझधारों का,
हैं करतें जो भक्ति साईं की,
उन्हें है मिलता आंगन बहारों का,

तारों से रहता नहीं आकाश भरा हमेशा,
फूलों से रहता नहीं जीवन भरा हमेशा,
हैं रखतें जो विश्वास ऊपर अपनें,
उन्हीं पर है रहता सदा हाथ साईं का,

है सिलसिला किनारों का,
नहीं ये सिलसिला मझधारों का,
हैं करतें जो भक्ति साईं की,
उन्हें है मिलता आंगन बहारों का 

कवि मनीष 
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Monday, 27 April 2020


माता के दर है लगता भक्तों का ताँता,
मन में जिनके प्रेम समाता,
है माता को बस वही भाता,

है बरसती बहार यूँ झूम झूमकर,
जैसे गिर रहें हों अम्बर से तारे टूट टूटकर,
है माता के दरबार का तो ग़ज़ब नज़ारा,
है जो जाता लौट के ज़रूर आता बारंबारा,

माता के दर है लगता भक्तों का ताँता,
मन में जिनके प्रेम समाता,
है माता को बस वही भाता 

कवि मनीष 
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प्रेम जब पहुँचे हिर्दय की गहराई तक, पराकाष्ठा पहुँचे उसकी नभ की ऊँचाई तक, प्रेम अगर रहे निर्मल गंगा माई के जैसे, वो प्रेम पहुँचे जटाधारी के ...