Friday, 31 January 2020

हे शिव है तू कालों का काल, है तू महाकाल,
जब करे धरती त्राहि-त्राहि, तू खोल अपनें नेत्र और ले आ भूचाल

कवि मनीष 
**************************************

Thursday, 30 January 2020


है जीवन तो जियो औरों के लिए,
शांति,अमन फ़ैलानें के लिए,
जो करता नहीं सत्य की इज़्ज़त,
वो विलुप्त है हो जाता अपवित्रता के दलदल में सदा के लिए  

कवि मनीष
३० जनवरी १९४८
महात्मा गाँधी पुण्य तिथी
**************************************


विद्यादायिनी माँ सरस्वती कर पूरी हम सब की मनःकामना,
दे तू हमें वो वरदान जिससे ज्ञानीं बनें हम और वसंत राज पधारें रोज़ हमारे अंगना 


वसंत पंचमी एवम् सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ 

कवि मनीष 
**************************************

Wednesday, 29 January 2020





है बढ़ जाता नीले गगन का अभिमान,
जब फहराता है हमारा तिरंगा महान
#कविमनीष
#बीटींगरिट्रीट
**************************************

Tuesday, 28 January 2020

है जीवन वो सागर,
जिसमें हैं छिपे अनेक ख़ज़ानें,
कभी ख़ुशी, कभी ग़म,
ये अक़्सर बाँटे,

कभी देता है साहिल,
तो कभी डूबोता है ये बीच मझधार,
कभी देता है काँटे,
तो कभी देता है ये रंगो भरी बहार,

है जीवन वो बाग़,
जो कभी शूल तो कभी पुष्प बाँटे,

है जीवन वो सागर,
जिसमें हैं छिपे अनेक ख़ज़ानें,
कभी ख़ुशी, कभी ग़म,
ये अक़्सर बाँटे 

कवि मनीष 
**************************************

Monday, 27 January 2020

है जीवन तो,
एक चलती कश्ती के समान,
कभी आँधी,कभी तूफां,

झेलती एक कश्ती के समान,
है जीवन तो,
एक चलती कश्ती के समान,

कभी मज़े में तो कभी सज़े में,
चलती एक कश्ती के समान,
है जीवन तो,
एक चलती कश्ती के समान,

कभी किनारे से मिलती,
तो कभी मझधार में फँसती,
एक कश्ती के समान,

है जीवन तो,
नीर पे मचलती,
कश्ती के समान,

है जीवन तो,
एक चलती कश्ती के समान,
कभी आँधी,कभी तूफां झेलती,
एक कश्ती के समान,

है जीवन तो,
एक चलती कश्ती के समान 

कवि मनीष 
**************************************

Saturday, 25 January 2020

आज आदमीं बात-बात पर है बन जाता लफंगा,
संविधान का वस्त्र फाड़कर है कर देता नंगा,
है आज हर रोज़ संविधान का पाठ पढ़ानें की ज़रूरत,
बस यही आज चाहत ए वतन है सीख देता मलंगा 
गणतंत्र दिवस की ढेरों शुभकामनाएँ ।

कवि मनीष **************************************

प्रेम जब पहुँचे हिर्दय की गहराई तक, पराकाष्ठा पहुँचे उसकी नभ की ऊँचाई तक, प्रेम अगर रहे निर्मल गंगा माई के जैसे, वो प्रेम पहुँचे जटाधारी के ...