क्या कहता है आसमां जीवन का है पता मुझे,
क्या कहती है बिखरती खुशबू है पता मुझे,
कौन है कहता कभी-कभी देर तक रात का है सिलसिला होता,
सर पे हाथ जो है मेरी माता का, क्या होती है सुबह बस है पता मुझे
कवि मनीष
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प्रेम जब पहुँचे हिर्दय की गहराई तक, पराकाष्ठा पहुँचे उसकी नभ की ऊँचाई तक, प्रेम अगर रहे निर्मल गंगा माई के जैसे, वो प्रेम पहुँचे जटाधारी के ...
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